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पीएम के फोकस के बाद नई शिक्षा नीति के अमल पर केंद्रित हुई चर्चा, पीएम ने कहा- स्कूलों में 5वीं तक स्थानीय भाषा के कारण बढ़ेगी सीखने की क्षमता

नई दिल्ली : नई शिक्षा नीति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले सुधारों को लेकर शिक्षा मंत्रलय और यूजीसी की अगुवाई में आयोजित सम्मेलन का पूरा नजारा ही बदल गया। सम्मेलन में जहां शिक्षा की समग्रता, शोध की गुणवत्ता जैसे विषयों पर चर्चा होनी थी, वहीं पीएम के संबोधन के बाद इसका पूरा फोकस नीति के अमल पर चला गया। इसमें नीति के ऐसे सभी प्रस्तावों को जल्द लागू करने पर सहमति बनी, जिनसे सरकारी खजाने पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ने वाला है।

नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किए गए सुधारों पर शुक्रवार को आयोजित इस सम्मेलन को पीएम के संबोधन के अलावा विचार-विमर्श के लिए भी तीन सत्र रखे गए। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों को शामिल किया गया था। लेकिन पीएम ने नीति के अमल को लेकर जिस तरीके से अपनी प्रतिबद्धता दिखाई और कहा कि वह आपके साथ इसके अमल को लेकर पूरी ताकत के साथ खड़े हैं, इसके बाद आगे के सत्रों में सारी चर्चा सिर्फ इसके आसपास ही सिमटी रही।

सम्मेलन के अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी नीति के तेजी से अमल पर जोर दिया। साथ ही मंत्रलय और यूजीसी के अधिकारियों को निर्देश दिया कि नीति के ऐसे उन सभी प्रस्तावों की पहचान की जाए, जिन पर प्रशासनिक आदेशों और राज्यों के साथ सामंजस्य बनाकर तेजी से आगे बढ़ा जा सके। उन्होंने इस दिशा में तेज काम करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इस पर अमल के जरिए हमें बताना है कि हम नीति ही नहीं बनाते हैं बल्कि उस पर पूरा अमल भी करते हैं। अगले तीन महीने में देश में ऐसा माहौल बनना चाहिए कि हर तरफ नीति की चर्चा हो। जिन प्रस्तावों पर तेजी से आगे बढ़ा जा सकता है, उनमें रोजगारपरक नए कोर्स शुरू करना, शिक्षकों के प्रशिक्षण के माड्यूल में बदलाव करना जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।

स्थानीय भाषा के कारण बढ़ेगी सीखने की क्षमता
स्कूलों में पांचवीं तक स्थानीय भाषा में पढ़ाने को लेकर उठ रहे सवालों के बीच पीएम मोदी ने साफ किया कि इनमें कोई विवाद नहीं है। स्थानीय भाषा में छोटे बच्चों को पढ़ाने से उनमें सीखने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। घर में जो भाषा बोली जाती है उसे बच्चे अच्छी तरह समझ लेते हैं। यही वजह है कि घर पर बोली जाने वाली भाषा को पढ़ाई की भी भाषा बनाने पर जोर दिया गया है। जहां तक संभव हो पांचवीं तक बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाया जाए। इससे उनकी नींव मजबूत होगी। उनकी आगे की भी पढ़ाई का आधार मजबूत होगा।

शोध व शिक्षा के बीच के अंतर को खत्म करने में मिलेगी मदद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस नीति के जरिए शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमारा फोकस भी बदला है। जिसमें अब ‘क्या सोच रहे हैं’ (व्हाट टू थिंक) की जगह ‘कैसे सोच रहे है’ (हाऊ टू थिंक) पर बल दिया गया है। पीएम ने कहा कि अब जो पाठ्यक्रम लागू होगा उसमें कोशिश होगी कि बच्चों को सीखने के लिए पूछताछ, खोज, चर्चा और विश्लेषण आधारित तरीकों पर जोर दिया जाए। इससे बच्चों में सीखने की ललक और कक्षाओं में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। शोध और शिक्षा के बीच के अंतर को खत्म करने में भी मदद मिलेगी।पीएम ने गुरु रवींद्र नाथ टैगोर और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को भी याद किया।


रुचि के आधार पर छात्र चुनेंगे कोर्स
प्रधानमंत्री ने कहा कि नई शिक्षा नीति छात्रों को अब यह मौका भी देगी कि वे अपनी रुचि और जुनून के आधार पर पढ़ाई कर सकें। अभी तक ऐसा नहीं था। जबकि नीति में अब ऐसी व्यवस्था होगी कि कोई भी छात्र किसी डिग्री या कोर्स में दाखिला ले सकता है और जब चाहे तब उसे छोड़ भी सकता है। वह अपनी नौकरी की जरूरत के मुताबिक कोई दूसरा कोर्स शुरू कर सकता है। नई नीति में इसके लिए अलग प्रवेश और निकलने के रास्ते सुझाए गए हैं। क्रेडिट बैंक के पीछे भी यही सोच है।

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