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यूपी बोर्ड के 65 हजार छात्र ढोएंगे बिना अंक की मार्कशीट

कोरोना काल में जारी बिना अंक की मार्कशीट यूपी बोर्ड के 65 हजार से अधिक छात्र-छात्राएं जिंदगीभर ढोएंगे। बोर्ड ने 31 जुलाई को बिना परीक्षा कराए हाईस्कूल और इंटरमीडिएट का परिणाम घोषित किया था। इनमें हाईस्कूल के 82,238 और इंटरमीडिएट के 62,506 कुल 144744 बच्चों के अंकपत्र पर अंक नहीं थे और उन्हें प्रमोट कर दिया गया।
जब पीड़ित छात्रों ने इस पर आपत्ति जताई तो उनसे अंकसुधार परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए कहकर बोर्ड ने अपना पीछा छुड़ा लिया। अपने रिजल्ट से असंतुष्ट हाईस्कूल के 37931 और इंटर के 41355 कुल 79286 छात्र-छात्राओं ने ही अंकसुधार परीक्षा के लिए फॉर्म भरा।

मान लें की अंकसुधार परीक्षा के लिए उन सभी छात्रों ने आवेदन किया जिनके अंकपत्र पर अंक नहीं थे। तब भी 65458 छात्र-छात्राएं ऐसे हैं जिन्हें बिना अंक के प्रमोट कर दिया गया और उन्होंने अंकसुधार परीक्षा के लिए आवेदन भी नहीं किया। अब ये छात्र बिना अंकपत्र की मार्कशीट ताउम्र ढोएंगे क्योंकि बोर्ड के अधिनियम में पास छात्र को दोबारा परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं है। यानि 12वीं में बिना अंक के प्रमोट छात्र भविष्य में दोबारा इंटर की परीक्षा में रेगुलर या प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में शामिल नहीं हो सकता।

बिना अंक के मार्कशीट से परेशानी तय

बिना अंक की मार्कशीट से इन छात्र-छात्राओं को भविष्य में कदम-कदम पर परेशानी का सामना करना पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर डीएलएड में प्रवेश हाईस्कूल, इंटर और स्नातक के अंकों के आधार पर मेरिट बनाकर होता है। बिना अंक वाले छात्रों की मेरिट नहीं बन सकेगी। इसी प्रकार परिषदीय प्राथमिक स्कूलों की शिक्षक भर्ती में भी 10वीं और 12वीं के अंकों को जोड़कर मेरिट बनाते हैं। इसके अलावा तमाम पाठ्यक्रमों में प्रवेश और नौकरी में परेशानी होना तय है।

बोर्ड को अंक देकर ही छात्र-छात्राओं को प्रमोट करना चाहिए था। बिना अंक के मार्कशीट इन छात्रों के लिए जीवन पर्यंत कष्ट का विषय बने रहेंगे और कॅरियर में अड़चनों का सामना भी करना पड़ेगा।

- शशिकांत मिश्रसेवानिवृत्त प्रधानाचार्य एवं राष्ट्रपति पुररस्कार विजेता

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