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विशेषज्ञों को विश्वविद्यालयों में 'professor of practice' बनाने का सिलसिला शुरू

नई दिल्लीः विश्वविद्यालय और कालेज अब छात्रों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं देंगे बल्कि विषय विशेषज्ञों के अनुभव से भी रूबरू कराएंगे। इसके लिए देश भर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 'professor of practice' के पदों को सृजित करने का काम शुरू हो गया हैं।

हरियाणा, राजस्थान सहित करीब दर्जनभर केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने professor of practice के लिए भर्तियां भी निकाल दी है। इसमें विषय विशेषज्ञ के साथ ही संबंधित क्षेत्र में शीर्ष पद पर पंद्रह साल का अनुभव रखने वाला कोई भी व्यक्ति आवेदन कर सकता है। उन्हें यह नियुक्ति सिर्फ एक साल के लिए मिलेगी, जो लगातार तीन साल तक बढ़ाई भी जा सकती है।

खास बात यह है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों में professor of practice के यह पद उनमें शिक्षकों की कुल स्वीकृत संख्या का दस फीसद या उससे कम ही होगा । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने हाल ही में इसे लेकर गाइडलाइन भी जारी की थी। साथ ही सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से अनुभव के आधार पर विशेषज्ञों की नियुक्ति करने के भी निर्देश दिए थे।

यूजीसी के मुताबिक इस पहल से उच्च शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार में होगा। साथ ही बच्चों में अपने विषय से जुड़ी समझ भी और बेहतर होगी। इसका बड़ा फायदा छात्रों को पढ़ाई के बाद संबंधित क्षेत्र में नौकरी करने के दौरान मिलेगा। वैसे भी यूजीसी इस साल से एक चार वर्षीय नया स्नातक कोर्स शुरू करने जा रही है, जिसमें छात्रों को रुचि के मुताबिक किसी स्किल का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।

इन क्षेत्रों में अनुभव रखने वाले बन सकेंगे प्रोफेसर

इंजीनियरिंग, विज्ञान, तकनीक, फाइन आर्ट्स, उद्यमिता, कामर्स, सामाजिक विज्ञान, मीडिया, साहित्य, सिविल सर्विसेज, आर्म्स फोर्स, लीगल प्रोफेशनल, पंचायती राज, ग्रामीण विकास, वाटर शेड डेवलपमेंट, जल संचयन, जैविक खेती, स्माल ग्रीन एनर्जी सिस्टम, नगरीय योजना, सामुदायिक भागीदारी, आदिवासी विकास, लोक प्रशासन आदि क्षेत्र शामिल है।

इसके अलावा विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षण संस्थान अपनी जरूरत के आधार पर अन्य क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों के लिए भी प्रोफेसर आफ प्रैक्टिस के पद सृजित कर सकते हैं। यूजीसी की गाइडलाइन के तहत विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर आफ प्रैक्टिस पदों पर नियुक्ति तीन श्रेणियों में होगी। इनमें पहली श्रेणी जिनके लिए उद्योग वित्तीय मदद देंगे और दूसरी श्रेणी संस्थान के अपने संसाधनों और जरूरत के आधार पर होगी जबकि तीसरी श्रेणी ऐसी होगी, जो अनुभव के आधार पर किसी को भी सम्मान के रूप में दी जाएगी।

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