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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला तय करेगा 98 लाख शिक्षकों का भविष्य, TET अनिवार्यता पर टली निगाहें

सुप्रीम कोर्ट में लंबित पुनर्विचार याचिका ने देशभर के 98 लाख शिक्षकों की उम्मीदें जगा दी हैं। अदालत के हालिया आदेश के बाद अब सभी शिक्षकों के लिए टीईटी (TET) पास करना अनिवार्य हो गया है, जिससे लाखों शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। इस फैसले से नाराज कई शिक्षक संगठनों और राज्य सरकारों ने न्यायालय में पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की हैं।


सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मामला

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षकों ने 2017 में आरटीई अधिनियम में किए गए संशोधन को चुनौती दी है। शिक्षकों का कहना है कि यदि सरकार ठोस कदम नहीं उठाती है तो वे जंतर-मंतर पर बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे। उनका तर्क है कि अचानक नियम बदलने से उनकी नौकरी पर संकट खड़ा हो गया है।

### याचिका खारिज हुई तो 98 लाख शिक्षकों पर खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और शिक्षकों की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी जाती है तो पूरे देश में 98 लाख शिक्षकों पर टीईटी पास करने का नियम लागू हो जाएगा। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही करीब 1,86,000 शिक्षक इस फैसले से प्रभावित होंगे। प्रभावित होने वालों में बीएड, बीपीएड और पुराने बीटीसी धारक शिक्षक शामिल हैं। वहीं मृतक आश्रित कोटे से चयनित इंटरमीडिएट योग्यता वाले शिक्षक भी इसके दायरे में आ जाएंगे।

एनसीटीई की भूमिका अहम

विशेषज्ञों के अनुसार, राहत तभी मिल सकती है जब एनसीटीई आरटीई अधिनियम की धारा 23(2) की स्पष्ट व्याख्या करे। यदि एनसीटीई पुराने शिक्षकों के लिए 2010 से पहले टीईटी पास करने की अनिवार्यता को हटा देता है तो याचिका में संशोधन की संभावना बनी रहेगी।

पुनर्विचार याचिका की प्रक्रिया

पुनर्विचार याचिकाएं पहले जजों के चेंबर में जाती हैं। यदि न्यायालय को इसमें नए तथ्य या साक्ष्य मिलते हैं तो इसे ओपन कोर्ट में सुनवाई के लिए लाया जाता है, अन्यथा चेंबर में ही खारिज कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में अधिवक्ताओं को मौखिक बहस का अवसर नहीं मिलता और निर्णय पूरी तरह लिखित याचिका पर आधारित होता है।

अक्टूबर तक आ सकता है फैसला

कानूनी जानकारों का अनुमान है कि अक्टूबर तक सुप्रीम कोर्ट इस पुनर्विचार याचिका पर अपना फैसला सुना सकता है। यदि याचिका खारिज होती है तो लाखों शिक्षकों को टीईटी पास करना अनिवार्य हो जाएगा। वहीं, शिक्षक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें राहत नहीं मिलती तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने और अपनी नौकरी की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।

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