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उच्च शिक्षा पर अयोग्य शिक्षकों का बोझ: प्राथमिक स्कूलों जैसी व्यवस्था वहां भी हो लागू

प्राथमिक स्कूलों जैसी व्यवस्था उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी नहीं लागू होनी चाहिए? एक निश्चित अंतराल के बाद क्या अयोग्य प्राध्यापकों को बाहर का रास्ता नहीं दिखा दिया जाना चाहिए?


सी भारतीय विश्वविद्यालय के कुलपति की कौन सी सलाह उसे अपने अध्यापकों के बीच अलोकप्रिय बना सकती है? क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि किसी अध्यापक को नियमित कक्षाएं लेने की हिदायत उसे किसी गाली से कम नहीं लगती। यह बात आपको अजीब लग सकती है कि जिस दायित्व के लिए चयन हुआ है, उसी में किसी शिक्षक की सबसे अधिक अरुचि हो। दुनिया में किसी अन्य मुल्क के लिए यह सच नहीं हो सकता, पर भारतीय शिक्षा जगत की यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का दुस्साहस कोई हितधारक नहीं करता। अध्यापकों के संगठन केवल वेतन-भत्तों में वृद्धि या किसी अध्यापक के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न हो, इसके लिए आंदोलन करते हैं। आपने कभी उन्हें अध्यापकों के नियमित रूप से अपनी कक्षाएं लेने या उनके बौद्धिक विकास की जरूरत के लिए लड़ते नहीं देखा होगा।

मैं केवल संयोगवश एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति हो गया और शुरुआत में ही एक दिलचस्प संयोग से मेरा पाला पड़ा। अपने दफ्तर में मुझे एक ऐसे चीनी छात्र का मेल मिला, जो कुछ ही दिनों पहले मेरे विश्वविद्यालय से हिंदी का एक कोर्स करके निकला था। बड़े विनोद से उसने लिखा था, भारत आकर उसे पहली बार पता चला कि छात्रों का एक दायित्व यह भी है कि वे कक्षा शुरू होने के समय ढूंढ़कर अध्यापक को याद दिलाएं कि उनको कक्षा लेनी है।

हुआ कुछ ऐसा था कि सत्र के प्रारंभ में चीनी छात्रों का एक समूह कक्षा में समय से जाकर बैठ गया। वे काफी देर तक अपने अध्यापक की प्रतीक्षा करते रहे और फिर ऊबकर इधर-उधर मटरगश्ती करने लगे। अचानक एक छात्र की नजर उस अध्यापक पर पड़ी, जो एक कमरे में दूसरे अध्यापकों के साथ बैठे ठहाके लगा रहा था। वह उसके पास गया और क्लास की याद दिलाई। अध्यापक ने उल्टे उसी को डांट पिलाई कि छात्रों ने उनको बुलाया क्यों नहीं?

अगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या शिक्षा मंत्रालय यह सर्वेक्षण कराए कि कितने प्रतिशत अध्यापक नियमित रूप से अपनी कक्षाएं ले रहे हैं, तो निश्चित रूप से उसे निराशा ही हाथ लगेगी। विभिन्न हितधारकों, जिनमें छात्र, अभिभावक और अध्यापक, सभी शरीक हैं, से बात करके मैं निश्चय से कह सकता हूं कि राजधानी दिल्ली में भी अधिकांश अध्यापक नियमित कक्षाएं नहीं ले रहे हैं।

मुझे एक और प्रसंग ने कक्षाओं को लेकर भारतीय शिक्षकों की दिलचस्पी को समझने में मदद की है। हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने विदेश में हिंदी पढ़ाने वाले अध्यापकों के लिए ‘रिफ्रेशर कोर्स’ आयोजित करने का फैसला किया और काफी बड़े बजट के साथ यह कार्यक्रम शुरू हुआ। दुनिया भर से आने वाले हर अध्यापक पर कई-कई हजार रुपये खर्च होते थे। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य होता था कि संपर्क करने पर बहुत से अध्यापक यह कहते हुए माफी मांग लेते थे कि प्रस्तावित तिथियों में आने से उनके पहले से निर्धारित पठन-पाठन के कार्यक्रम में बाधा पहुंचेगी। ऐसे उदाहरण भारतीय परिदृश्य में बिरले ही दिखेंगे। हमारे यहां ज्यादातर सेमिनार, पुनश्चर्या पाठ्यक्रम या अतिथि वक्तव्य तो होते ही हैं उन दिनों में, जब कक्षाएं अपने उरूज पर होती हैं। न किसी अध्यापक को इससे हिचकिचाहट होती है कि उसकी अनुपस्थिति से छात्रों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर पड़ेगा और न ही किसी विश्वविद्यालय के प्रशासन की जुर्रत कि वह सलाह दे सके कि ये सारी गतिविधियां उन्हीं दिनों भी हो सकती हैं, जब कक्षाएं न चल रही हों।

पठन-पाठन के प्रति इस उपेक्षा का सीधा असर शोध की गुणवत्ता पर भी दिखता है। अक्सर सुनने को मिलता है कि देश शोध पर उतना खर्च नहीं करता, जितना किसी विकासशील देश को करना चाहिए। मेरी समझ यह बनी है कि संसाधनों की कमी से अधिक गुणवत्ता निराश करती है। हमारे ज्यादातर शोध प्रबंध, खास तौर से मानविकी के क्षेत्र में, कूड़े से अधिक कुछ नही हैं। वे कट, कॉपी-पेस्ट के बेहतरीन नमूने तो हो सकते हैं, पर उनको ज्ञान के किसी भी अनुशासन को समृद्ध करने वाला नहीं कहा जा सकता। इस स्थिति के लिए भी छात्रों की अयोग्यता से अधिक अध्यापकों की उदासीनता और तिकड़म करके हासिल की गई हैसियत जिम्मेदार है।

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इसके अनुसार, प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक बनने या किसी तरह की तरक्की हासिल करने के लिए उम्मीदवारों को एक परीक्षा पास करनी होगी। जिन अध्यापकों के रिटायरमेंट में पांच से अधिक वर्ष बाकी हैं, उन्हें यह परीक्षा पास करनी होगी, अन्यथा उनको नौकरी से निकाल दिया जाएगा। यह प्रावधान संबंधित कानून में पहले से मौजूद था और राजनीतिक कारणों से सरकारें उदासीन बैठी थीं। अब भी कोशिश हो रही है कि इससे बचने के रास्ते निकाल लिए जाएं। यदि इसे ईमानदारी से लागू किया गया, तो प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में आजादी के बाद का यह सबसे क्रांतिकारी कदम होगा।

क्या इसी तरह की व्यवस्था उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी नहीं लागू होनी चाहिए? एक निश्चित अंतराल के बाद क्या अयोग्य शिक्षकों को बाहर का रास्ता नहीं दिखा दिया जाना चाहिए? यह एक दुखद यथार्थ है कि एक बार नौकरी हासिल करने के बाद अधिकांश शिक्षक पढ़ना-लिखना बंद कर देते हैं। अपने अनुशासन में दुनिया भर में जो कुछ नया घट रहा है, उससे पूरी तरह अनभिज्ञ अध्यापकों को बाबा आदम के जमाने के नोट्स से पढ़ाते देखना एक मनोरंजक अनुभव होता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने शिक्षकों की समयबद्ध प्रोन्नति की व्यवस्था कर दी है और कहने के लिए पुस्तकें/ शोध आलेख प्रकाशन जैसी कुछ शर्तें भी लगा दी हैं, पर शायद ही कोई विश्वविद्यालय किसी अध्यापक की प्रोन्नति रोकता है। संभवतः यही कारण है कि विश्वविद्यालय में घुसते ही अध्यापक पढ़ने-लिखने से अपना रिश्ता खत्म कर लेता है। अपने छात्रों के साथ समय बिताने से बेहतर विकल्प उनके लिए जमीन-जायदाद जैसा कोई धंधा या कोचिंग संस्थाओं में जाकर मोटी कमाई करना है। यह ताज्जुब की बात नहीं है कि सोशल मीडिया के इस दौर में अधिकांश अध्यापकों के प्रोफाइल के नेपथ्य में कोई मंहगी कार दिखती है, किताबों को आप बिरले ही पाते हैं!



विभूति नारायण राय पूर्व कुलपति

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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