आरटीई के तहत 25% आरक्षण लागू करना राष्ट्रीय मिशन: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करना एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस प्रावधान को ज़मीन पर उतारने के लिए ठोस और पारदर्शी नियम बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
गरीब बच्चों को समान शिक्षा का अवसर देना सरकार की जिम्मेदारी
न्यायालय ने टिप्पणी की कि कमजोर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच देना सरकार और संबंधित प्राधिकरणों का संवैधानिक दायित्व है। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।
नियमों की कमी पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई राज्यों में स्पष्ट नियमों, डिजिटल व्यवस्था, जानकारी के अभाव और प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण आरटीई के तहत आरक्षित सीटों का लाभ जरूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए केंद्र और राज्यों को सुधारात्मक कदम उठाने की सलाह दी।
2016 के मामलों का भी जिक्र
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2016 में कुछ मामलों में यह सामने आया था कि सीटें उपलब्ध होने के बावजूद बच्चों को आरटीई कोटे के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश नहीं मिल सका। ऐसे मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, जो व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है।
सरकारों को दिए गए अहम संकेत
- सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि
- प्रवेश प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनाई जाए
- ऑनलाइन सिस्टम को मजबूत किया जाए
- अभिभावकों को पर्याप्त जानकारी दी जाए
- शिकायत निवारण व्यवस्था स्पष्ट हो
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21-ए (शिक्षा का अधिकार) और आरटीई अधिनियम का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब 25% आरक्षण का लाभ वास्तव में गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों तक पहुंचे


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