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जातीय गणना में सत्यापन प्रणाली वाले सुझाव पर विचार करें : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और भारत के जनगणना आयुक्त को जनगणना-2027 में जाति की गणना सिर्फ स्व-घोषणा के बजाय एक सत्यापन प्रणाली आधार पर करने के सुझाव पर विचार करने को कहा।


साथ ही अदालत ने जनगणना में नागरिकों की जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इसमें प्रासंगिक मुद्दा उठाया है, ऐसे में सक्षम प्राधिकारियों को जनगणना अधिनियम-1958 के तहत इन सुझावों पर विचार करना चाहिए।

पीठ ने याचिकाकर्ता व शिक्षाविद आकाश गोयल से कहा कि जाति संबंधी आंकड़ों की पहचान के लिए पहले से तय कोई आंकड़ा नहीं है। पीठ ने कहा कि जनगणना की प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके तहत 1990 में बनाए गए नियमों के अनुसार संचालित होती है जो प्रतिवादी प्राधिकारियों को जनगणना करने के विवरण और तौर-तरीके तय करने का अधिकार देते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नजर नहीं कि याचिकाकर्ता द्वारा जताई गई आशंका के मद्देनजर महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय एक मजबूत व्यवस्था विकसित कर चुके होंगे।

हमें लगता है कि याचिकाकर्ता ने महापंजीयक को दिए गए प्रतिवेदन के जरिए कुछ प्रासंगिक मुद्दे भी उठाए हैं। इसके साथ ही, पीठ ने याचिका द्वारा प्रतिवेदन में दिए गए सुझावों पर विचार कर करने को कहा है। साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया। इससे पहले, याचिकाकर्ता गोयल की ओर से वरिष्ठ मुक्ता गुप्ता ने पीठ से कहा कि नागरिकों के जाति संबंधी विवरण दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले एक पारदर्शी प्रश्नपत्र को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि व्यक्तिगत शिकायत पर चुनाव प्रक्रिया आसानी से नहीं रोकी जा सकती। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत शिकायतों के संबंध में अंतिम और एकमात्र उपाय चुनाव याचिका के माध्यम से ही संभव है। पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के जुलाई 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निर्वाचन अधिकारी को एक व्यक्ति को एक चुनाव चिह्न आवंटित करने और उसे जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने की अनुमति देने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव लड़ने या उस पर सवाल उठाने का अधिकार वैधानिक प्रकृति का होने के कारण, इसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और उस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले कानून के अनुसार इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।

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