सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मतदान को अनिवार्य बनाने की वकालत की, ताकि अधिक से अधिक मतदाता वोट देने के अपने कीमती अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए मतदान केंद्र तक पहुंचे।
शीर्ष अदालत ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह मौखिक टिप्पणी की, जिसमें कहा गया है कि यदि सिर्फ एक उम्मीदवार भी हो, तब भी निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने के बजाए चुनाव कराए जाएं ताकि मतदाता नोटा (इनमें से कोई नहीं) के विकल्प चुनने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकें। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर चर्चा की कि क्या नोटा के आने के बाद मतदान में बढ़ोतरी हुई और उम्मीदवारों की क्वालिटी में सुधार हुआ है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ‘कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमें कोई प्रभाावी तंत्र बनाने चाहिए, बहुत सख्त नहीं, लेकिन कोई जरूरी तंत्र होने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि लोग मतदान केंद्र पर जाकर मतदान करें।’ मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि ‘ग्रामीण इलाकों में मतदान के दिन को जश्न के दिन के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि उस दिन महिलाओं को अपने दूसरे कामों से राहत मिलती है और वे समूह में गाने गाते हुए मतदान केंद्र तक जाकर मतदान करती हैं।’ जबकि न्यायमूर्ति बागची ने अपनी टिप्पणी में कहा कि कम से कम हमारा अनुभव तो यही कहता है कि पढ़े-लिखे और अमीर लोग, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की तुलना में काफी कम मतदान करते हैं। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और शिव खेड़ा की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि नोटा के नतीजे देने से अधिक लोग वोट देने के लिए राजी होंगे।
अभी, नोटा का कोई नतीजा नहीं है, इसलिए उस विकल्प को चुनने का कोई फायदा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है, जिसमें चुनाव मे एक उम्मीदवार रह जाने पर निर्वाचित घोषित करने का प्रावधान है।
शब्बीर शाह की याचिका पर पूछे एनआईए से सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका का विरोध करते हुए 1990 के दौरान कुछ कथित भड़काऊ भाषणों का हवाला देने पर एनआईए से सवाल किया। बुधवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि शाह के खिलाफ भड़काऊ भाषण वाले वीडियो और आपत्तिजनक ई-मेल सहित कई सबूत हैं। पीठ ने कहा कि ये भाषण नए नहीं हैं। ये तो 30 या 35 साल पहले से ही मौजूद थे।
न्यायाधीश को उनके फैसले के आधार पर संसद नहीं हटा सकती : संसदीय सूत्रों ने बुधवार को कहा कि किसी न्यायाधीश को उसके न्यायिक फैसले के आधार पर संसद द्वारा नहीं हटाया जा सकता।


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