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सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया पुरुष और महिला आरक्षण में अंतर

नई दिल्ली : वर्टकिल यानी सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण और हारिजेंटल यानी महिला, भूतपूर्व सैनिक आदि श्रेणी में दिया जाने वाला विशेष आरक्षण तय करने के मुद्दे पर जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस. र¨वद्र भट और जस्टिस ऋषिकेश राय की पीठ ने स्पष्ट फैसला दे दिया। पुरुष आरक्षण के मामले में अगर आरक्षित वर्ग का पुरुष उम्मीदवार सामान्य वर्ग की तय कटऑफ और मेरिट में ज्यादा अंक लाता है तो उसे सामान्य वर्ग का माना जाता है, लेकिन महिलाओं के बारे में अभी तक इस तरह की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी।

शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में 2013 की सिपाही भर्ती मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी श्रेणी की उम्मीदवार सोनम तोमर की अर्जी स्वीकार करते हुए कहा कि ओबीसी की महिला श्रेणी की सभी उम्मीदवार जिन्होंने ओपन (सामान्य) कैटेगरी की कटआफ 274.8928 से ज्यादा अंक अर्जति किए हैं, उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही की नौकरी दी जाए। चार सप्ताह में उन्हें उचित पत्र इस संबंध में भेज दिए जाएं। वे लोग उसके बाद दो सप्ताह में नौकरी के प्रस्ताव पर अपना जवाब दे देंगी। जवाब आने के बाद अन्य औपचारिकताएं पूरी की जाएं और नियुक्ति पत्र जारी किए जाएं।

इस फैसले में कोर्ट ने विशेष ध्यान रखते हुए कहा है कि वैसे तो जिनके अंक कम थे और नियुक्त कर दिए गए हैं उन्हें हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में वे लोग ट्रेनिंग पर भेजे जा चुके हैं और अभी पद बचे हुए हैं इसलिए उन्हें डिस्टर्ब नहीं किया जाए।

इस मामले में ओबीसी श्रेणी की सोनम की वकील विभा दत्त मखीजा ने उत्तर प्रदेश सरकार पर महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा था कि उनकी मुवक्किल ने सामान्य वर्ग की अंतिम चयनित उम्मीदवार से ज्यादा अंक अर्जित किए हैं, लेकिन उसे नौकरी नहीं दी गई। राज्य सरकार का कहना है कि महिलाओं का कोटा सामान्य वर्ग से ही भर गया है इसलिए इन्हें नियुक्ति नहीं दी जा सकती। मखीजा का कहना था कि जब आरक्षित श्रेणी के पुरुषों को समान्य श्रेणी की मेरिट में स्थान पाने पर समान्य वर्ग में गिना जाता है तो महिलाओं के साथ भी यही होना चाहिए।

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