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शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है : प्रो.जनक पांडेय

● पहले के चुनाव और आज के चुनावों में आखिर क्या बदलाव आया है? क्या आज हर वर्ग की भागीदारी इसमें बढ़ी है? अगर हां तो क्यों?

पहले के और वर्तमान में हो रहे चुनाव में काफी बदलाव आया है। समय, समाज और सरोकार बदला है। पहले के चुनावों की अपेक्षा पिछड़ी जातियों में जागरुकता बढ़ी है। उन्हें शिक्षा का लाभ मिला है। अब वे सत्ता और प्रशासन में हिस्सेदारी चाहते हैं। सामाजिक विमर्श का असर हर वर्ग पर पड़ा है। चुनाव चिंतन विमर्श को जन्म देता है। दलों को विमर्श के जरिए अपनी बात साझा करनी चाहिए। यदि विमर्श से दूर रहेंगे तो समाज से दूरी बढ़ जाएगी।

● आपने अब तक कई चुनाव देखे हैं, बतौर शिक्षक और विश्लेषक आपके अनुसार वर्तमान परिपेक्ष्य में कौन से मुद्दे हैं जो राजनीतिक दल अब उठा नहीं रहे हैं? जिसकी समाज को सीधे आवश्यकता है?

वर्तमान में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा उच्च स्तरीय शिक्षा पर विचार नहीं किया जाता है। जबकि ऐसे मुद्दे को प्राथमिकता देनी चाहिए। संविधान में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों की शिक्षा अनिवार्य है। सर्व शिक्षा अभियान भी चलाया गया। लेकिन बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने की राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव दिखा। आज प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था को और बेहतर बनाने की जरूरत है। यह मुद्दा समाज से सीधे तौर पर जुड़ा है।

● शिक्षा के बाजारीकरण को आप किस तरह से देखते हैं, क्या इस बाजारीकरण ने राजनीति में शिक्षा के प्रभाव को कम कर दिया है?

शिक्षा को बाजारीकरण हो गया है। शिक्षा कोचिंग पर निर्भर हो गई है। इसका प्रभाव बच्चों के विकास पर पड़ रहा है। कोचिंग अंक बढ़ाने का जरिया है, इसमें छात्र का समग्र विकास नहीं होता। बच्चों में सवाल पूछने की प्रवृति कम हो रही है। जिनके पास धन और संसाधन है वे अच्छी कोचिंग करते हैं। लेकिन जो समर्थ नहीं हैं वे लाभ नहीं उठा पाते। शिक्षा के बाजारीकरण पर राजनीतिक विमर्श नहीं होता।

● चुनाव में विश्वविद्यालय और शिक्षकों के मुद्दे बड़े नहीं दिख रहे हैं। ये मुद्दे अब राजनीति को क्यों प्रभावित नहीं कर रहे हैं?

बात सही है, कि इस चुनाव में न विश्वविद्यालय हैं और न ही शिक्षकों के कोई मुद्दे हैं। यह मुद्दे का विषय तब बनता जब चुनाव का मूल उद्देश्य समाज का विकास होता। इससे सामाजिक विकास को नई दिशा मिलती। आज भी देश का कोई विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकन के 100 स्थानों में जगह नहीं बना पाता। विश्वविद्यालय स्तर पर जब शोध और विमर्श होता था तो उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता था। यह मुद्दे अब राजनीतिक मुद्दे नहीं बनते हैं। इसका प्रभाव उच्च शिक्षा व्यवस्था पर दिखाई देता है।

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