📱 मॉडर्न पेरेंटिंग और मोबाइल का बढ़ता असर
आजकल की मॉडर्न मम्मियों के प्यार-दुलार का यह आलम है कि अब बच्चों को बिना मोबाइल खाना खिलाना या दूध पिलाना किसी राष्ट्रीय समस्या से कम नहीं लगता। “बस दो मिनट कार्टून लगा दो”, “वीडियो चालू कर दो तब खाएगा”—ये वाक्य आज के हर घर में सुनाई दे जाते हैं।
मोबाइल अब सिर्फ संवाद का साधन नहीं रहा, बल्कि बच्चों को चुप कराने, व्यस्त रखने और मनाने का सबसे आसान हथियार बन चुका है।
📌 मोबाइल सहारा या आदत?
शुरुआत अक्सर मासूम होती है—
“थोड़ी देर देख ले, तब तक खाना खा ले।”
लेकिन यही थोड़ी देर धीरे-धीरे आदत और फिर निर्भरता में बदल जाती है।
जब बच्चा हर बार मोबाइल देखकर ही खाना खाता है, तो उसका ध्यान भोजन से हटकर स्क्रीन पर केंद्रित हो जाता है। इससे:
- खाने की आदतें असंतुलित होती हैं
- ध्यान और एकाग्रता प्रभावित होती है
- बिना मोबाइल के बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है
😟 जिद और अड़ियल व्यवहार क्यों बढ़ रहा?
मोबाइल तुरंत मनोरंजन देता है। बच्चे के मन में यह बैठ जाता है कि उसकी हर मांग तुरंत पूरी होनी चाहिए।
जब मोबाइल नहीं मिलता, तो वह:
- रोता है
- जिद करता है
- गुस्सा करता है
धीरे-धीरे यह व्यवहार स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। परिणामस्वरूप एक पूरी पीढ़ी जिद्दी और अड़ियल होती जा रही है।
🧠 मानसिक और शारीरिक प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार (सामान्य शोधों के आधार पर):
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम से आँखों पर प्रभाव पड़ता है
- नींद का पैटर्न बिगड़ता है
- भाषा और सामाजिक कौशल का विकास प्रभावित होता है
- बाहरी खेल-कूद और शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है
बच्चों का बचपन अब मैदान से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन में सिमटता जा रहा है।
👨👩👧👦 समाधान क्या हो सकता है?
मोबाइल पूरी तरह बंद करना शायद व्यावहारिक न हो, लेकिन संतुलन जरूरी है।
✔️ खाने के समय नो मोबाइल नियम
✔️ कहानी सुनाकर या बातचीत करते हुए भोजन कराना
✔️ घर में “फैमिली टाइम” तय करना
✔️ बच्चों को आउटडोर खेलों के लिए प्रेरित करना
✔️ खुद भी माता-पिता मोबाइल उपयोग में संयम रखें
बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।
✍️ निष्कर्ष
मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसका अत्यधिक और गलत उपयोग समस्या है।
आज की सुविधा कहीं आने वाले कल की परेशानी न बन जाए, इस पर हर अभिभावक को विचार करना चाहिए।
डिस्क्लेमर: लेखक स्वयं भी इस समस्या का भुक्तभोगी है—और शायद आप भी! 😌


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